पाचन तंत्र व तन-मन को बेहतर बनाने वाले योग आसन
जिस तरह योग आज कई लोगो की ज़िन्दगी से रोगों को दूर कर रहा है। ऐसे ही योग हमारे पाचन तंत्र को भी दुरुस्त कर सकता है। पाचन तंत्र को मजबूत करने के लिए आप यहाँ बताये गये योगासनों को भी आजमा सकते है। इन्हें रोजाना करने से पाचनतंत्र में सुधार आता है और शरीर भी स्वस्थ और मजबूत बनता है।
3) भ्रामरी प्राणायाम
4) नौकासन
4) शीर्षासन
5) कपालभाति
6) शवासन
6) सूर्य नमस्कार
1) वज्रासन
वज्रासन करने के लिए जैसे नमाज पड़ते है उसी तरह से बैठ जाए। इस क्रिया में अपने शरीर का भार अपने पंजो और पैरों पर रख दे और दोनों हाथो को सामने घुटने की तरफ रखे। धीरे – धीरे साँस लेते रहे और छोड़ते रहे। ऐसा करते रहने से पाचन क्रिया ठीक रहती है और ख़राब नहीं होती।
2) अनुलोम-विलोम
विधि- बहुत कम लोगों को पता है कि नाड़ी शोधन कोई प्राणायाम नहीं, बल्कि एक पूरी प्रक्रिया है जिसकी शुरूआत अनुलोम विलोम प्राणायाम से होती है! नाड़ी शोधन प्रक्रिया में एक बहुत साइंटिफिक तरीके से यह भावना करनी होती है कि शरीर के अंदर प्रवेश करने वाली वायु शरीर की विभिन्न नाड़ियों का शोधन कर रही है, अतः यह प्रक्रिया बिना गुरु के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के संभव नहीं होती है! इसलिए यहाँ हम सिर्फ अनुलोम विलोम प्राणायाम का ही वर्णन कर रहें हैं!
अनुलोम-विलोम करने के लिए पहले सुखासन या पद्मासन में बैठ जाएं और आंखें बंद कर लें।फिर अपना दाएं हाथ के अंगूठे से नाक के के दाएं छिद्र को बंद कर लें और बाएं छिद्र से भीतर की ओर सांस खीचें। अब बाएं छिद्र को अंगूठे के बगल वाली दो अंगुलियों से बंद करें। दाएं छिद्र से अंगूठा हटा दें और सांस छोड़ें। अब इसी प्रक्रिया को बाएं छिद्र के साथ दोहराएं। यही क्रिया कम से कम 10 बार, उलट — पलट कर करें। इसे प्रतिदिन 7–10 मिनट तक करने की आदत डालें।
लाभ- मानव शरीर में स्थित 72 हज़ार नाड़ियों को हर तरीके से शुद्ध करने में बहुत अहम भूमिका निभाता है जिससे शरीर की असंख्य बीमारियों का नाश अपने आप धीरे-धीरे होने लगता है। हृदय प्रदेश में ईश्वरीय प्रकाश का उदय करता है जिसे कुछ वर्ष बाद इसका अभ्यासी स्पष्ट महसूस करने लगता है!
3) भ्रामरी प्राणायाम
भ्रामरी प्राणायाम करते समय भ्रमर अर्थात भंवरे जैसी गुंजन होती है, इसी कारण इसे भ्रामरी प्राणायाम कहते हैं। भ्रामरी प्राणायाम से जहां मन शांत होता है वहीं इसके नियमित अभ्यास से और भी बहुत से लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
विधि- सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर सर्वप्रथम दोनों होथों की अंगुलियों में से अनामिका अंगुली से नाक के दोनों छिद्रों को हल्का सा दबाकर रखें। तर्जनी को पाल पर, मध्यमा को आंखों पर, सबसे छोटी अंगुली को होठ पर और अंगुठे से दोनों कानों के छिद्रों का बंद कर दें। फिर श्वास को धीमी गति से गहरा खींचकर अंदर कुछ देर रोककर रखें और फिर उसे धीरे-धीरे आवाज करते हुए नाक के दोनों छिद्रों से निकालें। श्वास छोड़ते वक्त अनामिका अंगुली से नाक के छिद्रों को हल्का सा दबाएं जिससे कंपन उत्पन्न होगा।
जोर से पूरक करते समय भंवरी जैसी आवाज और फिर रेचक करते समय भी भंवरी जैसी आवाज उत्पन्न होना चाहिए। पूरक का अर्थ श्वास अंदर लेना और रेचक का अर्थ श्वास बाहर छोड़ना होता है।
सावधानी - भ्रामरी प्राणायाम को लेटकर नहीं किया जाता। नाक या कानों में किसी प्रकार का संक्रमण होने कि स्थिति में यह अभ्यास ना करें।
लाभ- इसे करने से मन शांत होकर तनाव दूर होता है। इस ध्वनि के कारण मन इस ध्वनि के साथ बंध सा जाता है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होकर एकाग्रता बढ़ने लगती है। यह मस्तिष्क के अन्य रोगों में भी लाभदायक है।
4) नौकासन
विधि- नौकासन करने के लिए पहले पीठ के बल नीचे लेट जाए। फिर अपने पैरों को, हाथों को और सिर को ऊपर को उठाएं, कुछ देर ऐसा करने पर फिर से अपनी पुरानी अवस्था में आ जाएं।
लाभ- नौकासन करने से पाचन तंत्र में सुधार आता है।
4) शीर्षासन
विधि- शीर्षासन किसी चद्दर या फिर कंबल पर करना चाहिए। इसके लिए आपको किसी सपाट जगह का चयन करना चाहिए। शीर्षासन के लिए सबसे पहले आपको वज्रासन में बैठना चाहिए। आप इस तरह से बैठें की आगे की ओर झुकने के लिए आपके पास भरपूर जगह हो। वज्रासन में बैठकर आप दोनों कोहनियों को जमीन पर टिकाकर दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में मिला लें। दोनों हाथों की अंगुलियों को मिलाकर आपकी हथेलियां ऊपर की ओर होनी चाहिए जिससे आप अपने सिर को हथेलियों का सहारा दे सकें। धीरे-धीरे आगे की ओर झुकते हए अपने सिर को हथेलियों पर रखें और सांस सामान्य रखें। फिर धीरे-धीरे अपने सिर पर शरीर का भार आने दें। इस स्थिति में आकर आपको अपने पैरों को आसमान की ओर उठाना है ठीक इस तरह से जैसे आप सीधें पैरों के बल खड़े होते हैं वैसे ही आप उल्टा सिर के बल खड़े हैं। कुछ देर इसी स्थिती में रहें और फिर सामान्य स्थिति में वापस आ जाएं।
लाभ- शीर्षासन को नियमित रूप से करने से आप पाचन संबंधी बीमारियों से आसानी से निजात पा सकते हैं। शीर्षासन से शरीर में रक्त संचार प्रक्रिया सुचारू रूप से काम करने लगती हैं।
शीर्षासन से शरीर को मजबूती मिलती हैं और शरीर हष्ट -पुष्ट बनता हैं। शीर्षासन के जरिए ही मस्तिक में रक्त संचार बढ़ता हैं जिससे याददाश्त बढ़ाने में मदद मिलती हैं। कब्ज, हर्निया जैसी बीमारियों से निजात पाने के लिए शीर्षासन करना चाहिए। बालों संबंधी समस्याओं, बालों के झड़ने की समस्या हो या फिर समय से पहले बाल सफेद होने की समस्या इनसे निजात पाने के लिए शीर्षासन करना चाहिए। शरीर को अधिक से अधिक सक्रिय करने और कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए शीर्षासन बहुत ही उपयोगी आसन हैं।
सावधानियां - पहली बार शीर्षासन किसी योग विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए।
यदि आप थोड़ा सा भी अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो आपको शीर्षासन करने से बचना चाहिए। पहली बार शीर्षासन के दौरान आप दीवार का सहारा भी ले सकते हैं। आपका रक्तचाप बहुत अधिक बढ़ा रहता है तो आपको शीर्षासन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। यदि आपको सर्वाइकल की समस्या है या फिर गर्दन में दर्द की समस्या है तो आपको शीर्षासन नहीं करना चाहिए। जिन लोगों को कम दिखाई देता है या फिर आंखों संबंधी कोई और समस्या हैं तो उन्हें शीर्षासन नहीं करना चाहिए।
5) कपालभाति
विधि- अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए, आराम से बैठ जाएँ। अपने हाथों को आकाश की तरफ, आराम से घुटनों
पर रखें। एक लंबी गहरी साँस अंदर लें। साँस छोड़ते हुए अपने पेट को अंदर की ओर
खींचे। अपने पेट को इस प्रकार से अंदर खींचे की वह रीढ़ की हड्डी को छू ले। जितना
हो सके उतना ही करें। पेट की मासपेशियों के सिकुड़ने को आप अपने पेट पर हाथ रख कर
महसूस कर सकते हैं। नाभि को अंदर की ओर खींचे। जैसे ही आप पेट की मासपेशियों को
ढीला छोड़ते हो, साँस अपने आप ही आपके फेफड़ों में पहुँच जाती है। कपालभाति प्राणायाम के एक
क्रम (राउंड) को पूरा करने के लिए 20 बार साँस छोड़े। एक राउंड खत्म होने के पश्चात, विश्राम करें और
अपनी आँखों को बंद कर लें। अपने शरीर में प्राणायाम से प्रकट हुई उत्तेजना को
महसूस करें। कपालभाति प्राणायाम के दो और क्रम (राउंड) को पूरा करें।
लाभ- जब आप कपालभाति प्राणायाम करते हैं तो आपके शरीर से 80% विषैले तत्त्व
बाहर जाती साँस के साथ निकल जाते हैं। कपालभाति प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से
शरीर के सभी अंग विषैले तत्व से मुक्त हो जाते हैं। किसी भी तंदुरस्त व्यक्ति को
उसके चमकते हुए माथे (मस्तक या सिर) से पहचाना जा सकता है। कपालभाति प्राणायाम की
उचित व्याख्या है, "चमकने वाला मस्तक”। मस्तक पर तेज
या चमक प्राप्त करना तभी संभव है जब आप प्रतिदिन इस प्राणायाम का अभ्यास करें। इसका
तात्पर्य यह है कि आपका माथा सिर्फ बाहर से नही चमकता परंतु यह प्राणायाम आपकी
बुद्धि को भी स्वच्छ व तीक्ष्ण बनाता है।
सावधानी - यदि आप
हर्निया, मिर्गी, स्लिप डिस्क, कमर दर्द, अथवा स्टेंट के
मरीज़ हैं तो यह प्राणायाम न करें। यदि आपकी कुछ समय पूर्व पेट की सर्जरी हुई है तब
भी यह प्राणायाम न करें। महिलाओं को यह प्राणायाम गर्भावस्था के दौरान अथवा उसके
तुरंत बाद नही करना चाहिए। मासिक धर्म के दौरान भी यह प्राणायाम नही करना चाहिए।
हाइपरटेंशन के मरीजों को यह प्राणायाम किसी योग प्रशिक्षण के नेतृत्व में ही करना
चाहिए।
6) शवासन
विधि- इस आसान को करने से पहले यह जान ले की इसे करते
समय आपको रिलैक्स महसूस करना है। इसलिए साफ़ सुथरी जगह चुने और चटाई बिछा ले| अब अपनी पीठ के
सहारे लेट जाएं और ध्यान रखे की इस अवस्था में आपके पैर ज़मीन पर बिल्कुल सीधे
होने चाहिए। अपने दोनों हाथों को शरीर से कम से कम 5 इंच की दूरी पर रखें। हाथों को इस तरह रखे की
दोनों हाथ की हथेलियां आसमान की दिशा में हो। अब शरीर के हर अंग को आपको ढीला
छोड़ना है, और आँखों को भी
बंद करना है। हल्की-हल्की साँसे लें। इस वक्त आपका पूरा ध्यान श्वांसों पर होना
चाहिए। मन में दूसरे किसी भी विचार को आने ना दे। इस आसान को करते वक्त यदि आपको
कमर या रीढ़ में किसी प्रकार की परेशानी मेहसूस होती है तो घुटने के नीचे कम्बल या
तकिया रख सकते हैं।
लाभ- उच्च रक्तचाप घटाए आरामदायक स्थिति में होने के कारण शवासन करने से शरीर तनाव
से मुक्त हो जाता है। फलस्वरूप रक्त संचार सुचारु रूप से प्रवाहित होने लगता है।
इसलिए जिन लोगों को उच्च रक्तचाप और अनिद्रा की शिकायत है उन लोगों को यह आसान
विशेषकर करना चाहिए। मानसिक और शारीरिक तनाव दूर करे ऐसे बहुत से आसान होते है
जिनकी मदद से हम मानसिक और शारीरिक तनाव को दूर कर सकते है। लेकिन समय की कमी या
फिर आलस के चलते हम उन्हें नहीं कर पाते। ऐसे में बिना मेहनत करे अगर आपको मन की
शांति पाना है तो शवासन इसमें आपकी मदद कर सकता है। इस आसान में बस आपको लेटना
होता है, शवासन में आपका
मन जितना ज्यादा शांत एवं एकाग्र होगा उतना ही अधिक इससे लाभ मिलता है।
सावधानियां- शवासन करते समय आँखें खुली हुई नहीं होना
चाहिए। आँखे हमेशा बंद रखे ताकि मन को शांति मिले। शरीर को बिलकुल भी टाइट ना रखे, इसे ढीला छोड़
दें। श्वास की स्थिति में शरीर को हिलाना भी नहीं चाहिए। शवासन करते समय अपने अंदर
ऐसा कोई विचार ना आने दे जिससे आपको मानसिक तनाव हो। आप के ध्यान को साँस की ओर
लगाकर रखें।
6) सूर्य नमस्कार
वैसे तो
सूर्य नमस्कार के 12 विधियां हैं जिनके नाम इस प्रकार है :-
1. प्रणाम आसन 2. हस्तपाद आसन 3. हस्तापदासना 4. अश्व संचालन आसन 5. दंडासन 6.
अष्टांग नमस्कार 7. भुजंग आसन 8. पर्वत आसन 9. अश्वसंचालन आसन 10. हस्तपाद आसन 11.
हस्तउत्थान आसन 12. ताड़ासन
लेकिन इनमें से 5 आसन जो बेहद लाभकारी है, आप इन्हें कर सकते हैं।
विधि- प्रणाम आसन- सबसे पहले आप नीचे कोई दरी बिछा लें और उसके
किनारे पर सावधान अवस्था मैं हाथ जोड़कर खड़े हो जाएँ। अपने दोनों पंजे एक साथ जोड़
कर रखें और पूरा वजन दोनों पैरों पर समान रूप से डालें। अपनी छाती फुलाएँ और कंधे
ढीले रखें। श्वास लेते हुए दोनों हाथ बगल से ऊपर उठाएँ और श्वास छोड़ते हुए
हथेलियों को जोड़ते हुए छाती के सामने प्रणाम मुद्रा में ले आएँ।
हस्तपाद आसन- अब श्वास लेते हुए अपने दोनों हाथों को ऊपर की
और उठाएँ और पीछे ले जाएँ व बाजुओं की द्विशिर पेशियों (बाइसेप्स) को कानों के
समीप रखें। इस आसन में पूरे शरीर को एड़ियों से लेकर हाथों की उंगलियों तक सभी
अंगों को ऊपर की तरफ खींचने का प्रयास करें।
हस्तपाद आसन- अब श्वास छोड़ते हुए व रीढ़ की हड्डी सीधी रखते
हुए कमर से आगे झुकें। पूरी तरह श्वास छोड़ते हुए दोनों हाथों को पंजो के समीप
ज़मीन पर रखें।
अश्व संचालन आसन श्वास लेते हुए जितना संभव हो दाहिना पैर पीछे
ले जाएँ, दाहिने घुटने को
ज़मीन पर रख सकते हैं, दृष्टि को ऊपर की ओर ले जाएँ।
भुजंग आसन- आगे की ओर सरकते हुए, भुजंगासन में
छाती को उठाएँ| कुहनियाँ मुड़ी रह सकती हैं। कंधे कानों से दूर और दृष्टि ऊपर की ओर रखें|












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