सुखमय जीवन के सिद्धांत
सिद्धांतों में जीवन जीने वाले लोग किसी भी विषय पर गंभीरता से सोचते हैं। इसलिए उस विषय से परेशान हो जाते हैं और सहज भाव से नहीं जीवन जी पाते। लेकिन जीवन का रहस्य कहीं किसी लॉकर में नहीं रखी होती है, यह तो आपके आंखे सामने होती है। बस पहचानने की नजर होनी चाहिए। इस बारे में ओशो की एक सूफी कहानी शेयर कर रहा हूं... एक बार किसी देश में युवा संतुलित आहार को लेकर जागरूक हो जाते हैं। वे सेमिनार का आयोजन करते हैं और आहार संबंधी कई विचार पेश करते हैं।
एक युवक ने कहा साबुत अनाज, फल और बीजों के साथ ही भरपूर आहार है। दूसरा युवा बोला सब्जियां और फल एक दूसरे के साथ मेल नहीं खाते। किसी एक का विचार था सप्ताह में या दस दिनों में एक दिन उपवास अवश्य रखना चाहिए। उसकी दोस्त ने कहा, खूब चबा कर खाओ, क्योंकि अन्न की कोशिकाओं में विटामिन्स होते हैं। यहां एक गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई, सबकी बातों में कुछ न कुछ सच्चाई थी। लेकिन कोई विचार पूरी तरह से सच नहीं थी। कुछ लोग कई तरह के आहार खा आजमाने लगे। कईयों ने तो यहां तक विचार बना लिया कि जो हम अन्न के बारे में सोच रहे हैं वह सर्वोत्तम होगा इससे ही मानवता का उद्धार होगा। एक दिन एक ज्ञानी पुरुष नगर में आया। सभी उस ज्ञानी पुरुष के पास पहुंच जाते हैं। लोग उससे भी भोजन और आहार के ही बारे में सवाल पूछने लगे। एक युवक ने पूछा, क्या मैं मांस खा सकता हूं? सुनते ही वहां सन्नाटा छा गया। लोग सुनने को उत्सुक थे, देखें ज्ञानी का पलड़ा किधर झुकता है। लेकिन ज्ञानी ने उलटा सवाल पूछ दिया, मांस खाते समय तुम्हें कैसा लगता है? युवक ने कुछ देर बाद बोला, बहुत अच्छा तो नहीं लगता। ज्ञानी ने कहा, फिर मत खाना। सभा में जो शाकाहारी पंथ के थे उनके बीच प्रशंसा की फुसफुसाहट सुनाई दी। लेकिन तभी एक और युवक खड़ा हो गया। उसने कहा, मांस खाते हुए मुझे बहुत अच्छा लगता है। ज्ञानी ने कहा, तब फिर जरूर खाना। सभा गंभीर हो गया। लोग असमंजस में घिर गए। तभी अचानक मंच पर आसीन ज्ञानी ने हंसना शुरू किया।
हंसी एक संक्रामक रोग है। अब आप हंसते हैं तो अकेले नहीं हंसते, आसपास के लोग भी उसमें शामिल हो जाते हैं। इसलिए कई लोगों के चेहरों पर मुस्कान फैल गई। विवाद करने वाले भी हंसने लगे। वातावरण भी गंभीरता खो गई। जैसा अक्सर होता है, हंसनेवालों में एक व्यक्ति ऐसा होता है जिसकी हंसी बड़ी ही हास्यास्पद होती है। ऐसा एक व्यक्ति वहां भी था। उसकी हंसी सुनकर ज्ञानी की हंसी के फव्वारे छूटने लगे। उसे सुन कर राह चलनेवाले भी आकर शामिल होने लगे। शहर में इस तरह का माहोल तो किसी ने कभी देखा नहीं था। शाकाहारी, मांसाहारी और अनाहारी सभी तरह के पंथ और धर्म के लोग ठहाके मार-मारकर हंस रहे थे। हास्य की खनक और ऊर्जा दूर-दूर तक अपनी तरंगें फैला रही थी।
लोग अंदर से बाहर तक मानो धुल गए। इस कदर आनंद उन्होंने बरसों में लिया नहीं था। उस आनंद का न कोई कारण था, न कोई लक्ष्य था, न कोई प्रयोजन। लेकिन समय, स्थान और पंथ की सभी सीमाएं उसमें विलीन हो गईं। आहार के सभी विकल्प और सिद्धांत उसमें बह गए। ज्ञानी और अज्ञानी की दीवारें टूट गईं। अब कोई पूछे इससे क्या हासिल हुआ, तो यह तो नहीं बताया जा सकता। हां, इतना कह सकता हैं कि उस दिन किसी का हाजमा नहीं बिगड़ा। जीवन के सिद्धांत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होते, महत्वपूर्ण होता है सहज जीवन का रस, उसकी खुशी।
एक युवक ने कहा साबुत अनाज, फल और बीजों के साथ ही भरपूर आहार है। दूसरा युवा बोला सब्जियां और फल एक दूसरे के साथ मेल नहीं खाते। किसी एक का विचार था सप्ताह में या दस दिनों में एक दिन उपवास अवश्य रखना चाहिए। उसकी दोस्त ने कहा, खूब चबा कर खाओ, क्योंकि अन्न की कोशिकाओं में विटामिन्स होते हैं। यहां एक गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई, सबकी बातों में कुछ न कुछ सच्चाई थी। लेकिन कोई विचार पूरी तरह से सच नहीं थी। कुछ लोग कई तरह के आहार खा आजमाने लगे। कईयों ने तो यहां तक विचार बना लिया कि जो हम अन्न के बारे में सोच रहे हैं वह सर्वोत्तम होगा इससे ही मानवता का उद्धार होगा। एक दिन एक ज्ञानी पुरुष नगर में आया। सभी उस ज्ञानी पुरुष के पास पहुंच जाते हैं। लोग उससे भी भोजन और आहार के ही बारे में सवाल पूछने लगे। एक युवक ने पूछा, क्या मैं मांस खा सकता हूं? सुनते ही वहां सन्नाटा छा गया। लोग सुनने को उत्सुक थे, देखें ज्ञानी का पलड़ा किधर झुकता है। लेकिन ज्ञानी ने उलटा सवाल पूछ दिया, मांस खाते समय तुम्हें कैसा लगता है? युवक ने कुछ देर बाद बोला, बहुत अच्छा तो नहीं लगता। ज्ञानी ने कहा, फिर मत खाना। सभा में जो शाकाहारी पंथ के थे उनके बीच प्रशंसा की फुसफुसाहट सुनाई दी। लेकिन तभी एक और युवक खड़ा हो गया। उसने कहा, मांस खाते हुए मुझे बहुत अच्छा लगता है। ज्ञानी ने कहा, तब फिर जरूर खाना। सभा गंभीर हो गया। लोग असमंजस में घिर गए। तभी अचानक मंच पर आसीन ज्ञानी ने हंसना शुरू किया।
हंसी एक संक्रामक रोग है। अब आप हंसते हैं तो अकेले नहीं हंसते, आसपास के लोग भी उसमें शामिल हो जाते हैं। इसलिए कई लोगों के चेहरों पर मुस्कान फैल गई। विवाद करने वाले भी हंसने लगे। वातावरण भी गंभीरता खो गई। जैसा अक्सर होता है, हंसनेवालों में एक व्यक्ति ऐसा होता है जिसकी हंसी बड़ी ही हास्यास्पद होती है। ऐसा एक व्यक्ति वहां भी था। उसकी हंसी सुनकर ज्ञानी की हंसी के फव्वारे छूटने लगे। उसे सुन कर राह चलनेवाले भी आकर शामिल होने लगे। शहर में इस तरह का माहोल तो किसी ने कभी देखा नहीं था। शाकाहारी, मांसाहारी और अनाहारी सभी तरह के पंथ और धर्म के लोग ठहाके मार-मारकर हंस रहे थे। हास्य की खनक और ऊर्जा दूर-दूर तक अपनी तरंगें फैला रही थी।
लोग अंदर से बाहर तक मानो धुल गए। इस कदर आनंद उन्होंने बरसों में लिया नहीं था। उस आनंद का न कोई कारण था, न कोई लक्ष्य था, न कोई प्रयोजन। लेकिन समय, स्थान और पंथ की सभी सीमाएं उसमें विलीन हो गईं। आहार के सभी विकल्प और सिद्धांत उसमें बह गए। ज्ञानी और अज्ञानी की दीवारें टूट गईं। अब कोई पूछे इससे क्या हासिल हुआ, तो यह तो नहीं बताया जा सकता। हां, इतना कह सकता हैं कि उस दिन किसी का हाजमा नहीं बिगड़ा। जीवन के सिद्धांत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होते, महत्वपूर्ण होता है सहज जीवन का रस, उसकी खुशी।



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